Best Motivational Poem in Hindi

होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन।…”


“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है l
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आस्माँ!
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है l…”


“सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।…”
Ramdhari Singh Dinkar


“राह में मुश्किल होगी हजार,
तुम दो कदम बढाओ तो सही,
हो जाएगा हर सपना साकार,
तुम चलो तो सही, तुम चलो तो सही।
मुश्किल है पर इतना भी नहीं,
कि तू कर ना सके,
दूर है मंजिल लेकिन इतनी भी नहीं,
कि तु पा ना सके,
तुम चलो तो सही, तुम चलो तो सही।…”


ऊँचे सपने थे पर पंखों में जान न थी ।
उड़ने की चाह थी। पर हौसलों में उड़ान न थी
सहारों को ताकते रहे खुद की पहचान न थी
मंजिल के इंतजार में थे पर रास्तों की तलाश न थी ।
अवसर की चाह रही पर अवसर की खोज न की ।
भीड़ में खो गए हम अकेले की पहचान न थी
ऊँचे सपने थे पर पंखों में जान न थी ।
उड़ने की चाहत थी पर हौसलों में उड़ान न थी ।


वक्त कुछ बंजर सा हवा में भी नमी न थी
जीवन नमकीन पानी सा स्वप्नों की भी जमीन न थी
बुलंद हौसलों की भी बहुत भारी कमी थी ।
अमुराईयों की मंजरियाँ बिन खिले ही शाखाओं से
मुरझा के झड़ने लगी कोकिला आशाओं से भरी
बिरहा गीत कूकने लगी सोने की चमक सी मंझरियाँ भी
कालिमा की गमक में अपनी आभा खोने लगी
शाम के बढ़ते कदमों ने स्वप्नों की डोर भी मन से
अपनी पकड़ खोने लगी ।


बाहर से खामोश ऊपरी सतह शांत है
अंदर से बेचैनी ,उदासी बढ रही है,।
उदासी का बेचैनी का कारण पता नहीं
पर खारे आंसू निर्झर बहते रहते है।
क्या पाया, क्या खोया हिसाब जन्मों जन्मों का
बही-खाते में अंकित करते रहते है
कुछ है जो छूट गया, उसे खोने की आह
कुछ है जो मिला नहीं,उसे पाने की चाह,
भावों की गणित में उलझी रहती हूँ।
लोगों से भयभीत दूर भागना चाहती हूं
भीड़ में भी अकेले होना चाहती हूं।


लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, बार बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर एक बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
हरिवंशराय बच्चन


जरूरी तो नहीं प्रेम रंगो- रोशन हो
हर बार जरूरी तो नहीं लालिमा इश्क की चटक हो
इश्क का रंग सुर्ख लाल हो कोकिल अपने गीतों से चहके
प्रेम की खुशबू दिशाओं में महके
हर बार जरूरी तो नहीं बिन खिले भी इश्क
शाखाओं से झड़ जाता है वक्त ,व्यक्ति की एना
जब इश्क पर गहराता है इश्क पर फना हो सभी
हर बार जरूरी तो नहीं हर कहानी अंजाम से
भरपूर मुकम्मल हो हर रिश्ते का कोई नाम हो
हर बार जरूरी तो नहीं हर बार जरूरी तो नहीं


घने जंगल ,कटीली झाड़ियों घनी पत्तियों, को चीरकर
सूरज की किरणें उनकी भयावहता को रौंदकर
धरा से मिलने को आतुर ताकि वसुधा के तम को ,
आह के गीलेपन को मिटा कर उसकी आभा में चमका
गौरव को दमका सके तम को प्रकाश का कृत्य
यह कब भाता है उसे तो अंधेरों की गहरी
बेबसी के आंसू ही भाते हैं मन भी सांसारिकता के
घने जंगल और कंटीली झाड़ियों से घिरा है ।
आत्मा के सूरज को चमकने से रोकता है ।
ज्ञान की रोशनी कभी मन को छू न जाए
रस ,गंध ,मोह,कामना, अहंकार क्रोध के कांटो में
बार-बार आत्मा को रौंधता है कर्मों के जाल में बांधकर
मानुष को अँधेरो में धकेलता है।


आज बड़े दिनों बाद मैंने फिर से मन के इंद्रधनुष को देखा
मैंने देखा कि इसमें हरा नीला रंग गहराने लगे हैं
इन रंगों के उभरने से लालिमा खत्म सी हो गई है
क्या यही संध्या है
क्या शाम ढलने लगी है और रंग गहरानें लगे हैं
अपना अस्तित्व खो कर एक ही रंग के होकर
यही शाम का मौन निमंत्रण है
भ्रम जाल है माया का, मंत्रणा का।


“गिरना भी अच्छा है,
औकात का पता चलता है…
बढ़ते हैं जब हाथ उठाने को…
अपनों का पता चलता है!

जिन्हे गुस्सा आता है,
वो लोग सच्चे होते हैं,
मैंने झूठों को अक्सर
मुस्कुराते हुए देखा है…

सीख रहा हूँ मैं भी,
मनुष्यों को पढ़ने का हुनर,
सुना है चेहरे पे…
किताबो से ज्यादा लिखा होता है…!”
अमिताभ बच्चन


आज मेरा ‘मै’ रूबरू हो ही गया
मेरा ‘मैं’ अभी भी बाकी है ।
इस अभिमान भरे एहसासों में मेरा ‘स्व’ अभी बाकी है ।
मेरी सांसो की रेत बहती है
मेरी रूह का पानी बाकी है ।
चेहरे की चमक भले फीकी हो पर रूह की महक बाकी है ।
वक़्त के थपेड़ों ने कुछ घाव दिए और कुछ घाव भरे
वक्त के खिसकने पर भी मेरे अरमानों की चाह बाकी है।
समय चक्र रुको तो सही
कहां भागे जाते हो सौ तरह की बेड़ियों से जकड़ी हूं ।
एक डग भरा जाता नहीं जग से कदम भले मिला न सकूं
पर मुझ में रफ्तार अभी बाकी है।


भ्रम के मायाजाल में ऐसे उलझ कर रहें
कि समय रेत सा फिसल गया ।
हम सीपियों की तलाश में थे
और वक़्त भी हमसे दूर निकल गया
रेत की चट्टानों पर हम अपना कारवां बनाते रहें
तूफानों की जिद भी ऐसी थी
हमारे हर निशान मिटाते रहे,
इस जिद में हम राह से भी भटक गए ।
हमारा वक्त भी हमसे दूर निकल गया ।


हर पल है जिंदगी का उम्मीदों से भरा,
हर पल को बाहों में अपनी भरा करो,
किस्तों में मत जिया करो।

सपनों का है ऊंचा आसमान,
उड़ान लंबी भरा करो,
गिर जाओ तुम कभी,
फिर से खुद उठा करो।

हर दिन में एक पूरी उम्र,
जी भर के तुम जिया करो,
किस्तों में मत जिया करो।

आए जो गम के बादल कभी,
हौसला तुम रखा करो,
हो चाहे मुश्किल कई,
मुस्कान तुम बिखेरा करो।

हिम्मत से अपनी तुम,
वक्त की करवट बदला करो,
जिंदा हो जब तक तुम,
जिंदगी का साथ ना छोड़ा करो,
किस्तों में मत जिया करो।

थोड़ा पाने की चाह में,
सब कुछ अपना ना खोया करो,
औरों की सुनते हो
कुछ अपने मन की भी किया करो,
लगा के अपनों को गले गैरों के संग भी हंसा करो,
किस्तों में मत जिया करो।

मिले जहां जब भी जो खुशी,
फैला के दामन बटोरा करो,
जीने का हो अगर नशा,
हर घूंट में जिंदगी को पिया करो,
किस्तों में मत जिया करो।
विनोद तांबी


तल्ख़ियां चुभती है तो चुभती रहे
चुभन का एहसास जरा उन्हें भी हो,
यह तल्ख़ियां ,कांटे उनसे ही मिले थे
हमने तो बस उन्हें ही लौटा दिये हैं।

दफन होती नहीं चिंगारियां
राख में कभी भी ,
हवाएं इशारा करें तो,
बहक उठती है कभी भी ।
Manju Saklani


“…सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो सही तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए”


छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता
अटल बिहारी वाजपेयी

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर,
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर,
झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात,
प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूं,
गीत नया गाता हूँ||

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी,
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी,
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूँ||
atal bihari vajpayee


जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था|
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िंदगी से बड़ी हो गई|

मौत की उमर क्या है, दो पल भी नहीं,
ज़िंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं|
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ|

तू दबे पाँव चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा|
मौत से बेख़बर, ज़िंदगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई रात बंसी का स्वर|

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं|
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला|

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए|
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है|

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई|
ठन गई, मौत से ठन गई!!
-atal bihari vajpayee

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हार नहीं मानूंगा, रार नयी ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं गीत नया गाता हूं”


“…प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते”


तू ख़ुद की खोज में निकल
तू किसलिए हताश है
तू चल तेरे वजूद की
समय को भी तलाश है
जो तुझसे लिपटी बेड़ियाँ
समझ न इनको वस्त्र तू
ये बेड़ियाँ पिघाल के
बना ले इनको शस्त्र तू
तू ख़ुद की खोज में निकल…”
Tanveer Ghazi


चल तू अकेला!
तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो तू चल अकेला,
चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला!
तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो चल तू अकेला,
जब सबके मुंह पे पाश..
ओरे ओरे ओ अभागी! सबके मुंह पे पाश,
हर कोई मुंह मोड़के बैठे, हर कोई डर जाय!
तब भी तू दिल खोलके, अरे! जोश में आकर,
मनका गाना गूंज तू अकेला!
जब हर कोई वापस जाय..
ओरे ओरे ओ अभागी! हर कोई बापस जाय..
कानन-कूचकी बेला पर सब कोने में छिप जाय….
– रवीन्द्रनाथ टैगोर – Rabindranath Tagore


पुष्प की अभिलाषा
चाह नहीं मैं सुरबाला के,
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में,
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव,
पर, हे हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएँ वीर अनेक।
– माखनलाल चतुर्वेदी – Makhanlal Chaturvedi


सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं।
सच है, विपत्ति जब आती है कायर को ही दहलाती है।।
सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते।
विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं।।
मुँह से न कभी उफ़ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं।

जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग निरत नित रहते हैं।।
शूलों का मूल नसाते हैं, बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं।
है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके आदमी के मग में।।
ख़म ठोंक ठेलता है जब नर पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।।

गुन बड़े एक से एक प्रखर।
हैं छिपे मानवों के भीतर।।
मेहँदी में जैसी लाली हो, वर्तिका बीच उजियाली हो।
बत्ती जो नहीं जलाता है, रोशनी नहीं वह पाता है।।
Author:- रामधारी सिंह दिनकर


हर सुबह एक मौका है,
अपने आप को साबित करने का,
चाहतों को पूरा करने का,
कुछ रिश्तो को थामने का,
अपने आप को सवारने का,
लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने का,
यह सुबह बहुत कुछ अपने साथ लाईं है!..बहुत कुछ!
-Avinash ~Hindi Jazbaat~


खामोशी में अपनी महनत छुपा लेना,
बंद मुट्ठी में दो जहां बसा लेना।
कम पड़े जमीन तो,
आसमान चीर लाना।
अपनी कामयाबी का इस कदर,
तू परचम लहराना।


तेरे जितने अरमान हैं,
सब पूरे होंगे।
ठहरने वाले के भी,
ख़्वाब शुरू तो जरूर होंगे।
तुझे रुकना नहीं है,
तुझे बनाने वाले के भी
कुछ सपने तो जरूर होंगे।


मायूस होकर किस्मत को ना टटोल,
खाली गुल्लक की तरह,
रह जाएगा।
सूरज की तरह मुस्कुरा,
आज नहीं तो कल,
तेरा वक़्त जरूर आएगा।


लिखी होती जो किस्मत खुदा ने,
तेरे हाथ की लकीरों में।
तू मिटा बना उन्हें रोज खेलता,
फिर सोचता की क्या रखा है, मेहनत में।


मरना आसान है मगर,
दर्द देता है अपनों को।
तुझे प्यार है अगर उनसे,
तो जिंदगी को बेहतर बना।


मुस्कुराओ तो फूलों की तरह,
शरमाओ तो बेलों की तरह।
अगर चमकना हो तो सितारे बन जाना,
जो करनी हो हुकूमत,
तो कुछ करके दिखाना।